Young man

In the wee hours after midnight
I am still awake
Consciously aware of what’s around
Yet
Unconscious about what’s inbound
What I am thinking about
Is a journey
Which each one of us
Unknowingly undertakes
The journey with an idea
The idea of treading an unknown path One hell of an adventure
The sight of beautiful mountains
The calm flow of stream
The hustle to climb the top
All the pain endured
The glory at the summit
The sense of accomplishment
The gloomy mindset on the way back
The sick feeling of being lost
The fear of loosing
Losing any speck of dust
That you have earned till now
The doubt that always stays in the back of your head
That maybe none of this is possible
Yet we continue
With the thrill of going for another ride
In Search of another high
And a thought that this will be different

Well believe me,
It’s all the same… Till we change.

Though all you have is some scars
The scars that you are gonna proudly showoff
The stories of your adventures
Even the ones where you loose
Your stories that will be told
to the generations to come
Maybe just the good parts
Or the ones with their selfish interests
But you will be remembered
For the all crossed list
Of things to do
That took you a lifetime to accomplish
And forget the tens of lives
That worked for it
Silently in the backdrop
Of your glittering success
Although a front page coverage
Just in case you falter.

The ray of light far ahead
Just enough to be visible
To mark it’s presence
Brings me back from this trance
To make sure
if I am ready for another ride
another day, another life
But
I never was a traveller
I never was average
I am Just a young man
Full of Silly thoughts
And a will
To conquer it all.

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हिचकी

बचपन की कुछ यादें
माँ की कही कुछ बातें
जो पहले मैं हँसी में टाल दिया करता था
अब कभी सामने आती हैं
तो आश्चर्य तो होता ही है
साथ ही साथ उन्हें सुन कर
ख़ुशी की एक लहर सी भी दौड़ पड़ती है
ऐसे ही कुछ
जब कल देर रात मुझे
एक हिचकी आ गई
तो पहला ख्याल
माँ की कही उस बात का आया कि
कोई याद कर रहा है
ऐसा अक्सर वो कहती थी
और मैं हर बार हँस दिया करता था
तर्क वितर्क के इस फ़ैशन में
ऐसा मानने वाली मेरी माँ
शायद अकेली ही ऐसा सोचती होगी
उसकी मासूमियत और स्नेह भरे
ऐसे कुछ ख्यालात
बड़े ही अप्रमाणित और अवैज्ञानिक से लगते थे
पर कल रात जब मुझे हिचकी लगी
और तुम भी पास नहीँ थी
तो पहला ख्याल ज़हन में यही आया
और माँ की कही इस बात में
कुछ तर्क
कुछ स्वार्थ सा दिखने लगा
अगली हिचकी आने पर तो जैसे
तुम्हारे साथ होने की अनुबभूति सी ही हो गई
चेहरे पर भीनी सी मुस्कान
और दिल को सुकून सा मिल गया
क्या माँ की बात सच थी
सच ही होगी
अब तो ऐसा ही मानूंगा
और एक हिचकी और ले लूंगा

कोरा कागज़

एक कोरे कागज़ पर
वो पहला अक्षर लिखना
एक कवि की वो पहली रचना
बड़ा ही विस्मयकारी सा अनुभव है
ख़ुशी की एक लहर
मानो शरीर से गुज़र गयी हो
सुखद तो है ही
साथ ही ये बड़ा रचनात्मक अनुभव भी है
ऐसा लगता है मानो
शब्दों में हमने प्राण से फूंक दिए हों
जिनका अब अपना अलग अस्तित्व है
ऐसा प्रतीत होता है जैसे
एक कहानी लिखी जा रही हो
जिसमे हम अभिनय तो कर ही रहे हैं
साथ ही इसके (चित्रकार) रचयिता भी हम ही हैं
फिर भी
एक ख़ौफ़ सा मन में रहता है
एक कश्मकश सी रहती है
एक संकोच सा रहता है
कुछ सवाल लिए मैं
एक प्रश्ननवाचक चिन्ह की तरह मैं घूमता रहता हूँ
सवाल ये नहीँ के लिखना क्या है
सवाल ये भी नहीँ की लिखना कैसे है
सवाल तो बस ये है कि
उस कोरे कागज़ को अगर सियाही से डूबे
अपने ख्यालों से मैं रंग दूँ
तो कहीँ उसकी सादगी को
कहीँ उसकी पार्देशिता को
कहीँ उसकी मासूमियत को
कहीँ उसकी रूहानियत को
कहीँ उसके अस्तित्स्व को
ठेस न पहुंचा दूँ
कहीँ उसका अस्तित्सव को मिटा न दूँ
मज़े की बात ये है कि
तुमसे बात करना
या तुम्हारे बारे में बात करना भी
कुछ ऐसा ही अनुभव है
उतावला हो कर मैं
कुछ लिख तो देना चाहता हूँ
कुछ कह तो देना चाहता हूँ
कुछ रच तो देना चाहता हूँ
पर वही कश्मकश
वही संकोच
वही डर फिर बांध देता है
मेरे ख्यालों को भी
मेरे शब्दों को भी
और इस कलम को भी

शायद और कभी

लोग आए
कुछ बातें हुई
हंसना गाना हुआ
और फिर चले गए
मेरे सामने की कुर्सी
आज भी खाली है
दिल का वो कोना
आज भी खाली है
जाने तुम कब आओगे
आओगे भी या नही
मालूम नही
दिल का वो कोना
आज भी सूना है
कभी भरेगा भी या नही
मालूम नही
एक मुद्दत सी हो गयी
तुम्हे देखे हुए
फिर भी कभी
दिल में निराशा नही छाई
व्यस्त हो तुम
कुछ तो मजबूरी रही होगी
तो क्या हुआ
कभी तो फुर्सत मिलेगी
तो भूल कर
उसी रोज़ लौट आना
घर की एक चाबी
तुम्हारे इंतज़ार में
वहीँ रखी है
जहाँ आखरी बार तुम रख गयी थी
तुम्हारे इंतज़ार में
अब तो उसे भी जंग खा रहा है
पर तक़दीर से मेरी जंग
जारी है
कितना समय दूर रह पाओगी
कितने बहाने बनाती रहोगी
इन काली रातों में तो
अब चाँद भी शर्मा कर
कहीँ छुप सा जाता है
मेरे गीतों की वो डायरी
आखरी पन्ने तक भर गई है
पंकज उदास की वो उदास ग़ज़लें
दुःख भरा ये संगीन संगीत
मायूस करने वाले ये बोल
अब हक़ीक़त से लगते है
कांच की रंगीन बोतल
में बचा वो आखरी जाम
आज शाम का वो किस्सा है
जो शुरू तुम्हारी
मीठी बातों से हुआ
और अंत
तुम्हारे न होने के
कड़वे एहसास से
कांच की रंगीन बोतल का
ये आखरी जाम
तुम्हारी उन मीठी ज़हर
यादों की तरह है
और गौर करना
दोनो ही खत्म हो रही है
वापस तो तुम्हे आना होगा
वरना जामों का ये सिलसिला
और मदहोशी की ये शाम
दोनों अधूरे हैं
और सुनो
आते हुए
एक जाम लेते आना
कुछ शिकवे भी हैं तुमसे
कुछ रुस्वे भी हैं
पर सभी भुला कर तुम्हे गले लगाना है
अब कहीँ
मेरी इस मदहोशी को बुरा मत समझ लेना
मेरी इस मदहोशी को बेकार मत समझ लेना
मेरी इस मदहोशी को बचकाना मत समझ लेना
इस मदहोशी को मज़ाक मत समझ लेना
इस मदहोशी में सघनता भी है
इस मदहोशी में मेरा पहला प्यार भी है
इस मदहोशी में मेरा इज़हार भी है
इस मदहोशी में तुम्हारो पहली झलक का सुरूर भी है
इस मदहोशी में तुम्हारे बिछड़ने का गम भी है
इस मदहोशी में तुम पर आकरोश भी है
इस मदहोशी में दर्द भी है
इस मदहोशी में तुम्हारी यादों की मरहम भी है
इस मदहोशी में तुम्हारे वापस आने की आशा भी है
इस मदहोशी में तुम्हारे साथ न होने की निराशा भी है
इस मदहोशी में मेरा गुरूर भी है
इस मदहोशी में मेरा वजूद भी है
ये जाम भी खत्म हो चला
बस ये मदहोशी ही रह गयी है मेरे पास
तुम्हारी अनुपस्थिति का ये सुरूर चले जाये
उस से पहले ही आ जाना
आखरी जाम तो तुहारे साथ
तुम्हारे लिए ही होगा
तो भूल कर
आज वापस आ जाना
भूल से ही सही
दो शब्द प्यार से बोलना
इस भूल का इंतज़ार रहेगा
इस दिन का इंतज़ार रहेगा
मेरे सामने की कुर्सी
आज भी तुम्हारे लिए खाली है
मेरे दिल का वो कोना
आज भी तुम्हारे लिए खली है
फुर्सत मिले
तो शायद मिलेंगे कभी
शायद और कभी

गंभीर

इस गंभीरता का राज़ क्या है
दिल में छुपा ये साज़ क्या है
क्यों हो तुम खुद से इतने दूर
किस बात का है ये सुरूर
क्यों तुम साधना के अकेलेपन में लश हो
क्यों दुनिया को मानते तुम ज़हर भरा कश हो
साथ हो जिनके
उनके पास नहीँ हो
पास हो जिनके
आस पास नहीँ हो
उखड़े से रहते क्यों हो
मन की बात कहते नहीँ हो
रातों को जागते हो
दिन भर खुद को कोसते हो
चका चौन्ध की दुनिया में
क्यों तुम सादे से रंग हो
चका चोन्ध की दुनिया में
कैसे तुम सादे से रंग हो
कोनसे उस रब के ख्यालों में मदहोश हो
फिर भी मन में रखते आक्रोश हो
सांसे तुम गिनते हो
पर मेरा कुछ ख्याल नही
मानते तो तुम भी हो
अगर कह देते
तो उठता ये सवाल नही
इस गंभीरता का क्या राज़ है
दिल में छुपा ये साज़ क्या है

तो कैसा होता…

सोचता हूँ
कि तुम साथ होती
तो कैसा होता…
आस पास होती
तो कैसा होता…
दिल में तो बस्ती ही हो
पर आँखों के सामने होती
तो कैसा होता…
हाथ से छू सकू
इतने करीब होती
तो कैसा होता…
हर साँस की तरह
मुझमे समायी होती
तो कैसा होता…
हर लम्हे मैं तुम्हे चुनता
और तुम मुझे
तो कैसा होता…
हर सपने में तो तुम हो ही
हकीकत में भी मेरी होती
तो कैसा होता…
और अगर हकीकत में तुम मेरी हो
और ऐसा मुझे भी पता हो
तो कैसा होता…
अगर ऐसा कुछ कभी होता
तो कैसा होता…।

मन का शोर

(अब) मेरे मन में हर दम एक शोर सा रहता था
मेरे अपने ही सपने फिर भी एक चोर सा रहता था
न अपनी करता था
न मेरी सुनता था
बड़ा ही कम्बख्त सा था ये दोस्त मेरा
न काम करने देता था
न चैन से बैठने देता था
बस मेरी असफलताओं पर व्यंग
और मेरी उम्मीदों पर पानी फेरता रहता था
इस दोस्ती ने कोई गौरव गाथा तो क्या देनी
बस पेट भरने को एक नौकरी दिला दी
नौकरी क्या थी साहब
गुलामी थी
चंद रुपयों की गुलामी
जिसमे था तो सिर्फ
किराये का मकान
हर महीने का उधार
और अंधकार
इस किराये के घर में रहते रहते
ये सपने कब किराये के हो गए…
पता ही नही चला…।
भीतर की वो आवाज़ कब शोर बन गयी…
पता ही नही चला…।